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कवि का निर्माण विश्व के किसी भी प्रशिक्षण संस्थान में नहीं होता क्योंकि कविता तो प्रकृति का वरदान है और अभ्यास करते करते व्यक्ति कवि बन जाता है।


कवि चन्द्रबरदाई की पंक्तियॉ “चार बांस, चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण, तहाँ बैठो सुल्तान है, मत चुको चौहान” या बंकिम चन्द्र चटर्जी द्वारा रचित “वन्दे मातरम्” या सुभद्रा कुमारी चौहान की “खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी” या राम प्रसाद बिस्मिल की “सरफरोशी की तम्मना अब हमारे दिल में है” या मैथली शरण गुप्त की “हम क्या थे, क्या हो गये, क्या होना है अभी” और भी अनेक उदाहरण राष्ट्र के आजादी आन्दोलन में कवि और कविता के योगदान के दिये जा सकते है।
आज भी राष्ट्र अनेक राष्ट्रीय आपदाओं जैसे – आतंकवाद, अलगाववाद, माओवाद, घुसपैठ, सीमाओं पर बढते कुछ पड़ोसी देशों से खतरे, बढती जनसंख्या, धर्मान्तरण (मतान्तरण), अन्तर्राष्ट्रीय ताकतों के अन्दरूनी षड़यन्त्र, बदलता जनसंख्या का स्वरूप, अल्पसंख्यकवाद, तुष्टीकरण की वोट राजनीति, गऊवध का न रुकना, हिन्दुत्व को संकुचित बताना, प्रगतिशीलता के नाम पर देवी-देवताओं का अपमान, कैलाश मानसरोवर व अन्य भू-भाग चीनी कब्जे में, अफजल को फांसी की बजाय माफी, कंधार प्रकरण में आतंकवादी छोड़ना, वन्दे मातरम् न गाना, रामसेतु तोड़ना, एक राष्ट्र व राष्ट्रीयता का अभाव, समान कानून संहिता के अभाव में बिखरता व भ्रमित समाज, जातिवादी विषमता का दंश, अपराध, भ्रष्टाचार, घोटाले, व्यसन, अशिक्षा, प्रदूषण, सांस्कृतिक जीवन मूल्यों में गिरावट, उपभोक्तावाद आदि-आदि से घिरा अपना राष्ट्र मुक्ति के लिए छटपटा रहा है।
कवि व्यक्तिगत रूप में उपरोक्त समस्याओं पर अपनी कलम चलाता है परन्तु आवश्यकता है सामूहिक रूप से आन्दोलन के रूप में कुछ करने की।
साहित्यकार, लेखक, चिकित्सक, अभियन्ता, उद्योगपति भिन्न-भिन्न वर्गों के लोग आज समूह के रूप में कार्य करते है परन्तु कवि समाज आज तक इस रूप में कार्य करता हुआ दिखाई नहीं पड़ा।
एक कविता कई भाषणों का निचोड़ होती है क्योंकि कविता में रोचकता होती है इसलिये युवा पीढ़ी सहजता से कविता की ओर आकर्षित होती है।
आजादी की महान क्रान्ति के 150 वर्ष एवं स्वतन्त्रा प्राप्ति के 60 वर्ष पूर्ण होने पर 2007 में 22-23 दिसम्बर को दिल्ली में राष्ट्रीय कवि संगम का आयोजन कवि समाज के राष्ट्रीय नव निर्माण में सामूहिक भूमिका निश्चित करने का एक एतिहासिक कार्य होगा।

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